पुरुषार्थ !!

आज एक घटना ने पुनः स्मरण करा दिया की ज्ञान का आधार संचेतन मन और ह्रदय की निर्मलता है, मन में यदि किसी भी प्रकार की उहापोह अथवा कोलाहल हो तो प्राणी उचित और अनुचित का निर्णय करने में असमर्थ हो जाता है.

जीवन तो है ही संघर्षीं की गाथा, किसी के जीवन में काम तो किसी के जीवन में ज्यादा किन्तु संघर्ष तो करना ही है। संघर्षों के डर से समस्या भाग जाना उसका हल नहीं क्यूंकि वो तो करना ही पड़ेगा किन्तु हाँ यदि ये डर ह्रदय में प्रवेश कर गया तो व्यक्ति स्वयं पर अपना नियंत्रण खो देता है और ऐसे डरे हुए लोगों से कुछ भी कराने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करने पड़ते।

सुख दुःख अथवा सुख ही सुख या दुःख ही दुःख किसी भी व्यक्ति के वष में नहीं होते वरन परिस्थितियां और भाग्य उनका अंकुश अपने हाथ में रखता है. दुर्भाग्य को बदला तो नहीं जा सकता किन्तु पुरुषार्थ से उनका प्रभाव कम किया जा सकता है.

सहश्रों कोटि नमन मेरे पिता को जिन्होंने संघर्षो में अडिग रहने की शिक्षा देकर ये सिखाया की किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति का पुरुषार्थ ही उसका सहायक ना कोई व्यक्ति और कुछ अन्य।

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