जीवन भी कितनी तेजी से भागता है, बचपन में पहाड़ सा लगने वाला बचपन आज ऐसे लगता है जैसे पलों में बीत गया बस अभी की ही तो बात है जैसे आज आँख खुली वैसे ही पिछले रविवार भी तो उठा था मै दादा जी पिताजी सब टीवी के सामने बैठे थे रामानंद सागर कृत “श्री कृष्णा” का वो मधुर भजन “श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी ..” चल रहा था, ऐसे रविवार की मधुरतम भोर होती उसके बाद मोगली के आने प्रतीक्षा में २ प्लेट पोहा चटकार के मोगली देखने बैठ जाते.

“देखो दरवाजे पर कोई मित्र खड़ा है” (दादा जी ने कहा)
“अरे रुक जा आया”

दोस्त को बोलकर में भी कपडे पहन ने निकल लिया, बाहर निकल कर जैसे ही दरवाजा बंद किया …

“कब तक आओगे भैया खाना वाना खाओगे की नहीं?” (पिताजी ने टोका) … “जल्दी आ जाऊंगा पिताजी” कहकर अपन भी निकल लिए.

फिर क्या तुलसी नगर से लेकर सर्रापीपल, बड़ा पत्थर, वेस्ट लेण्ड एक करते हुए मैले कुचेले घर पहुँचते तो पिताजी की फिर वही सुनी सुनाई पंक्तियाँ सुनने मिलती

“नहाना धोना तो पाप है शायद, अरे राम राम गोपी क्यूँ तू इस घर में पैदा हो गया रे?”
“पिताजी रोज़ तो नहाता हूँ, आज छुट्टी है रहने दो ना.”

हा हा बस फिर क्या पिताजी कुड़कुड़ाते हुए सब्जी लेने निकल जाते और अपन रसोई में

“गुडिया का बनो है?”
“लाल भाजी, दाल चावल और रोटी”
“जल्दी ले आओ भूख लगी है अरे गुडिया दो पापड़ भी सेंक दे बेटा”
“ये बड़े भैया भी ना दिन भर तंगाते रहते हैं” हा हा बेचारी सारा काम भी करती जाती और गुस्सा भी.

खाना खाया अपने पुराने फिलिप्स पॉवर हाउस में कैसेट घुसेड के २ ४ गाने सुने फिर निकल लिए खाना पचाने, इधर उधर गप्पें हाक के घर पहुंचे तो पिताजी ने फिर व्यंगात्मक तरीके से टोका –

“भैया बस्ता क्या स्कूल से घर और घर से स्कूल लाने ले जाने के लिए खरीदे हैं, खोल भी लिया करो कभी किताब कापियां सड़ ना जाएँ”

मन मार के बस्ता खोल तो लिया लेकिन बैठे हिंदी की किताब लेकर वो भी विज्ञान की किताब के अन्दर, आधा एक घंटा पढने का नाटक करके लगे उबासियाँ लेने –

“हाह !! पिताजी २५ रुपये दे देना कल स्कूल में देना है २ दिन का संघ शिविर है”
“सुबह ले लेना”
“गुडियाss”
“क्या है?”
“अरे बेटा खाना वाना खिला दे यार”
“कित्ता खाते हो बड़े भैया आप थकते नहीं हो?”

ले भाई गुडिया भी ताना मार के निकल गई, साला कोई इज्जतई नहीं है, यहाँ सर खुजाते हुए अपन भी टीवी के सामने फिर पसर गए.

“पिताजी पिताजीsss जल्दी आओ दो आँखें बारह हाथ आ रही है” (हम बाप बेटों की पसंदीदा फिल्मो में से एक)
“आया आया”
“गुडिया मेरा खाना यहीं ले आना टीवी वाले रूम में”

इतना कह कर पिताजी की तरफ देखा, बस देखा क्या जैसे गुनाह कर दिया, पिताजी पट्ट से बोले –

“कितनी बार मना किया है टीवी देखते देखते खाना नहीं खाते, रसोई में जाओ और अच्छे से शांत मन से भोजन करके आओ, भोजन तन को लगेगा और शारीरिक विकास होगा, मानसिक विकास तो अब संभव नहीं तुम्हारा”

मन मार के रसोई में बैठे खाना खाने, खाना शरीर में लगे तो लगे कैसे मन तो खाने से ज्यादा टीवी में लगा है, ये पिताजी लोग समझते क्यूँ नहीं?

बस फिर क्या भोजन हो गए, बीच बीच में जितनी बार विज्ञापन या अंतराल आता पिताजी की डांट खाते खाते थोड़ी देर टीवी देखी और पसर गए बिस्तर में.

अरे यार, कल गजेन्द्र पाल (बचपन के सबसे कठिन पहलवान वाले बुद्धि वाले मास्साब) ने गृहकार्य दिया था, लग गई अब तो “गोलू ने कर लिया होगा” अरे यार क्या बहाना मारूं? सोचते सोचते नींद आ गई और रविवार ख़तम.

me and dad

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