खलिल जिब्रान लेबॅनॉन देश का लेखक. इ. स. १८८३ में उसका जन्म हुआ, और १९३१ में उसकी मृत्युहुई. ४८ वर्ष की अल्पायु में उसने अनेक पुस्तकें लिखी. उनमें से अधिकांश का विश्‍व की प्रमुख भाषाओं मेंअनुवाद हुआ है. उसकी मर्मज्ञता, प्रतिभा और संक्षिप्त में सखोल आशय व्यक्त करने की शैली असामान्य है.

जिब्रान की कहानियों में एक पात्र- अल मुस्तफा ‘वो देश’ कैसा है इसका वर्णन कर रहा है. वह वर्णनहमारे देश को भी या ये कहें सब देशों को कैसे लागू होता है, यह देखने लायक है. जिब्रान लिखता है

‘‘वो देश दयनीय है, जो निर्दयी मनुष्य को शूरवीर समझता है और घमण्ड़ दिखानेवाले को उदार समझता है.’’

‘‘वो देश दयनीय है, जो स्वयं बनाए कपड़े परिधान नहीं करता और अपने देश में बनी मदिरा नहीं पीता.’’

‘‘वो देश दयनीय है, जो स्वप्न में विशिष्ट इच्छा का तिरस्कार करता है और जागृति में उसी इच्छा के स्वाधीन रहता है.’’

‘‘वो देश दयनीय है, जो शवयात्रा के अलावा अन्य समय अपनी आवाज नहीं उठाता, अपने इतिहास के प्राचीन अवशेषों के अलावा अभिमान करने जैसी कोई भी वस्तु जिसके पास नहीं, जो गर्दन पर तलवार का आघात होने की नौबत आए बिना कभी विद्रोह नहीं करता.’’

‘‘वो देश दयनीय है, जिसकी राजनीतिज्ञ एक लोमड़ी है, जिसका तत्त्वज्ञ एक जादुगर है और जिसकीकला बहुरूपिये के स्वांग से आगे नहीं गई है.’’

‘‘वो देश दयनीय है, जो अपने नए राजा का धूमधाम से स्वागत करता है और तुरंत ही उसकी अवहेलना कर उसको बिदा करता है- इसलिए कि नए राजा का धूमधाम से स्वागत करने की व्यवस्था हो.’’

‘‘वो देश दयनीय है, जिसके महान् पुरुष अनेक वर्षों से गूंगे हैं और जिनके शूरवीर अभी पालने में सोए हैं.’’

‘‘वो देश दयनीय है, जो अनेक टुकड़ों में बँटा है और हर टुकड़ा स्वयं को संपूर्ण देश समझता है’’

भारतवर्ष और हिन्दू समाज की वर्तमान स्थिति कुछ इसी प्रकार से बनी हुई है. जब तक की भारतवर्ष अखंड और हिन्दू समाज एक था सुखी सम्रद्ध और संपन्न था परन्तु जयचंदों की अतिमहत्वकांक्षा और लालच ने सर्व प्रथम तो भारतवर्ष पराधीनता का मार्ग दिखाया, खंडित किया फिर खुले हाथों लुटने दिया.

वर्तमान स्थिति ये है की भारतभूमि आज भी उन्ही जयचंदी वंशजों पराधीन है और लुटपिट रही है, वो लुटेरे फल फूल रहे हैं, और गौरवशाली इतिहास को भूल हिन्दू समाज सो रहा है.

Advertisements