बहुत समय से दफ्तर दफ्तर खेल खेल कर थक गया था, चौखटा उबासियों से भरा ऐसा लगने लगा था जैसे सूज गया हो, दिल्ली कि गर्मी, धुल और धुप ने तन मन झुलसा दिया था, मन में था कि कहीं उड़ा जाए पर समय का आभाव और वित्त का गड़बड़ाया सा प्रबंधन इस बात के लिए अनुमति नहीं दे रहा था, पर अब जब भाग्य में प्रवास लिखा हो तो अपने आप आकांक्षाओं को पंखुडियां लग ही जाती हैं. विगत दिनों कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ, मित्रों ने एक योजना बनाई जिसके तहत हमें कुछ कारणों वश उत्तराखंड में कुछ जगहों पर जाना था बस फिर क्या था चल दिए झोला झंगा उठाकर.

मेरे लिए ये बात ऐसे थी जैसे बिन मांगे मोती मिल गया हो क्यूंकि मै स्वयं उत्तराखंड के नैसर्गिक सौंदर्य के दर्शन के आतुर था और एक कारण यह भी था कि मै गढ़वाल देखना चाहता था क्यूंकि मेरे नाम के आगे “गढ़वाल” लगा है जो कि मेरा उपनाम या कुलनाम है.लगभग हज़ार वर्षों से हम मध्य प्रदेश कि पावन भूमि में रहते आये हैं, मेरे दादा परदादाओं ने जिस भूमि को स्वयं आपने श्रम से सिंचित किया है वहां भी हमारे पूर्वज गढ़वाल कि भूमि से ही आये थे.
वैसे तो मै ऋषिकेश तक जा चुका था पर वहां के मूल निवासी मेरे मित्रों का कहना था कि वहां का असली सौंदर्य तो उसके आगे ही है तो आतुरता और व्यग्रता बढती ही जा रही थी और जब देखा तो इस बात कि अनुभूति भी हो गई कि वास्तव में उत्तराँचल नैसर्गिक स्वर्ग है.

यात्रा के दौरान हमारा प्रथम प्रवास ऋषिकेश में मेरे मित्र के एक सम्बन्धी जो उनके मामा जी हैं के निवास पर हुआ जहाँ पहुँच कर गढ़वाली परम्परानुसार भेंट की जिसे गढ़वाली में “पिठाई” लगाना कहते हैं, मेजबान महमान के आगमन और प्रस्थान पर हल्दी, कुमकुम और चावल के दानो ने मस्तकाभिषेक करते हैं फिर थोडा अल्पाहार और विश्राम के बाद हम कुछ पागलपंती करने ऋषिकेश से २० किलो मीटर ऊपर शिवपुरी चल दिए जहाँ हमें गंगाजी की प्रचंड धाराओं में एक नौका में स्वर होकर बेडा चलाना था अर्थात राफ्टिंग करना था मुझे वैसे तो ऊंचाई और पानी से दर लगता है पर फिर भी दल के मुखिया के आग्रह पर मैंने भी हामी भर दी और राफ्टिंग के लिए सुरक्षात्मक दृष्टि से आवश्यक साजो सामान के साथ गंगा जी में कूद पड़े, कहते हैं न संगठन में शक्ति है इसलिए डर जरा जरा कम होने लगा था और मित्रों के साथ साथ मेरा भी उत्साह बढ़ के चार हो गया और जम कर इस रोमांचकारी साहसिक कार्य को अंजाम दिया.

gopi krishan garhwal - river rafting

रात्रि विश्राम पश्चात् हम नरेन्द्र नगर के रास्ते माँ कुंजापुरी के दर्शनों के लिए आगे बढे, सौभाग्य से हमें माता के दर्शन अच्छे से हो गए और उस से भी सौभाग्यशाली बात मेरे लिए यह थी की उस दिन मेरा जन्मदिवस था तो स्वाभाविक सी बात है की मेरे मन की प्रफुल्लता और भी बढ़ गई थी.

gopi krishan garhwal @ Kunjapuri

माता कुंजापुरी के दर्शनों के बाद हम चंबा के रास्ते होते हुए नयी टिहरी पहुंचे दरअसल पुरानी टिहरी शिला निर्मित बांध बन जाने के कारण वास्तविक टिहरी शहर जलमग्न हो चुका था और नयी टिहरी शाशन ने पुरानी टिहरी से कईओं मील ऊपर पहाड़ों की चोटी पर निर्मित कर पुरानी टिहरी के विस्थापितों के आवंटित कर दी थी, हम ऊपर से वास्तविक टिहरी के सर्वोच्च शिखर पर निर्मित टिहरी के राजा के महल हो जलमग्न होते देख रहे थे. टिहरी बांध विश्व का तीसरा सबसे बड़ा “रॉक फिल डेम” है जिसके अन्दर कई पर्वत समां चुके हैं और जलस्तर और भी बढ़ रहा है अर्थात अभी यह बांध और भी भरना बाकि है.

gopi krishan garhwal photography

पूरे दिन के भ्रमण के बाद हम उत्तराखंड के श्रीनगर नमक स्थान पर पहुंचे जहाँ से १२/१४ किलो मीटर दूरी पर माता धारी देवी का सिद्ध स्थान है. श्री नगर में रात्रि विश्राम के पश्चात् तडके लगभग ५.३० हम धारी देवी के दर्शनों के लिए रवाना हुए वहां पहुंचकर गंगाजी के शीतल जल में जम कर जलक्रीडा फिर स्नान के पश्चात् देवी के मंदिर में पूजन कर के हम सीधे ऊणी ग्राम पहुंचे जहाँ मेरे मित्र के मौसी मौसा जी का निवास था.

पर्वतों पर गाँव से दूर एकांत में उनका निवास बहुत सुन्दर स्थान पर था जहाँ से ऊंचे ऊंचे पहाड़ों, झरनों और आम के बगीचों का दृश्य बड़ा सुन्दर था, प्रकृति की गोद में सुरक्षित एकांतवास मिल जाये तो बस फिर क्या कहने, ऐसे स्थानों में ये कवी मन हिलोरे मारने लगता है, खैर कुछ देर उत्पात मचाने के बाद हम उसी दिन पौढ़ी शहर के लिए प्रस्थान कर गए जहाँ हमने रात्रि विश्राम राइन गाँव में किया, वो रात्रि मेरे लिए बड़ी रोमांचकारी और अविस्मरनीय थी पूरी रात्री हमने आदमखोर बाघों के भय के साये में व्यतीत की थी. प्रातः ५ बजे उठकर घर के सामने हिमालय की सर्वोच्च छोटी अर्थात एवेरेस्ट के दर्शन के लिए बैठ गए परन्तु दुर्भाग्य से जंगलों में फैली आग की धुंध के कारन नहीं देख पाए, फिरर जलपान कर खिर्सू नमक शीतल स्थान पर निकल गए जो की पौढ़ी से १४ किलोमीटर आगे और ऊंचाई पर स्थित है वहां थोडा भ्रमण करके हम पुनः कंडोलिया आ गए और लगभग ४ ५ घंटे इसी रमणीक स्थान पर व्यतीत किये.

संध्या होने को थी और हमें दिल्ली वापस प्रस्थान करना था लेकिन हमने एक और रात यहीं ठहरने का मन बना लिए और रात हमने खंडहा श्रीकोट के पास एक गाँव कोठी में व्यतीत की, हालाँकि अँधेरा हो जाने के कारण हम कुछ ख़ास देख तो नहीं पाए पर हाँ दिल्ली की सदी गर्मी से दूर ये शीतल स्थान किसी स्वर्ग से कम नहीं था और उस पर अचानक हुई वर्षा ने मंत्रमुग्ध कर दिया, ऐसा लग रहा था मानो सारे स्वप्न मूर्त रूप ले चुके हों.

प्रातः ४ बजे वहां से प्रस्थान करने के बाद देवप्रयाग के रास्ते होते हुए गंगाजी के साथ साथ बढ़ते हुए हम लगभग १२ बजे ऋषिकेश पहुंचे वहां कुछ देर विश्राम और भोजन पानी के पश्चात् सीधे दिल्ली.

इन पूरे ५ दिनों में मैंने जो भी और जितना भी अनुभव किया सब बहुत सुखद और प्रसन्नता दायक था. देवभूमि और वहां के सीधे सज्जन लोगों ने बहुत प्रभावित किया. जीवन में जब भी और जितनी बार भी मुझे उत्तराँचल जाने का सुअवसर मिलेगा मै प्रयास करूँगा की मै जाऊं.

Advertisements