विगत जबलपुर प्रवास के दौरान मैंने प्रयास किया की मै जबलपुर के ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करूँ और इस प्रयास में मैंने अपना रुख सबसे पहले नर्मदा माँ के घाटों की तरफ किया मैंने चौंसठ योगिनी मंदिर और आस पास के अन्य मंदिरों के चित्र आप तक पहुंचा रहा हूँ.

चौंसठ योगिनी मंदिर का वैसे तो सही सही इतिहास कहीं अंकित नहीं है परन्तु यह मंदिर जबलपुर के कलचुरी साम्राज्य कि निशानी है, कोकल्ल प्रथम ने लगभग 845 ई. में कलचुरी वंश की स्थापना की थी, उसने त्रिपुरी को अपनी राजधानी बनाया था जो कि जबलपुर के शहर से लगभग ८ से ९ किलोमीटर कि दूरी पर स्थित है, चूंकि वर्तमान जबलपुर पहले मात्र गढ़ा (अपभ्रंश “गढ़”) तक सीमित था जो कि गौंड राजाओं कि राजधानी बना था इस से पूर्व गौंड राजाओं कि राजधानी नागपुर हुआ करता था.

चौंसठ योगिनी मंदिर जबलपुर के भेडाघाट क्षेत्र में स्थित है, यह मंदिर एक छोटे पहाड़ी टीले पर स्थित है जिसका वास्तु खजुराहो के मंदिरों से लगभग मिलता जुलता है, मुख्य मंदिर चारों ओर से मजबूत दीवारों से गोलाकार घिरा हुआ है जिसके भीतर चौंसठ देविओं कि खंडित मूर्तियाँ विराजमान है, ये मूर्तियाँ इतिहास के सबसे मूर्ख, दुर्बुद्धि और क्रूर इस्लामी शासक औरन्गजेब ने खंडित कि थीं.

ऐतिहासिक दृष्टि से चौंसठ योगिनी मंदिर जबलपुर महानगर कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संरक्षित धरोहरों में से एक है.

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इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए लम्हेटा घाट के एक अत्यंत प्राचीन मंदिर जा पहुंचा, वहां के ग्राम वासियों के अनुसार ये खंडहर कहलाता है लेकिन जब मै मंदिर के भीतर पहुंचा तो मेरी कल्पनाओं ने उस सदी का वो दृश्य देख लिया जब ये मंदिर खंडहर नहीं रहा होगा और अति भव्य मंदिर रहा होगा.

इस मंदिर का इतिहास तो मै आपको ठीक ठीक नहीं बता सकता लेकिन ये मंदिर गौंड राजाओं के शाशन से भी पहले का है जिसे मेरे मतानुसार कलचुरी राजाओं ने बनवाया होगा. मंदिर की वास्तु शैली ने मुझे बड़ा प्रभावित किया और मंदिर की मजबूती का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है की बिना किसी सरकारी या निजी देखरेख के भी सहत्रों वर्षों से ये मंदिर ज्यूँ का त्यूं खड़ा है.

मंदिर के भीतर शिव जी का छोटा सा चबूतरा है जिसमे शिव लिंग नहीं है लेकिन जिलहरी जस की तस है जिसके नीचे इस मंदिर के पुनरुद्धार की तिथि अंकित है जो की संवत १८७३ है, अब सोचिये की जिस मंदिर का पुनरुद्धार संवत १८७३ अर्थात लगभग २५० वर्ष पूर्व हुआ था उस मंदिर का निर्माण कब हुआ होगा.

वैसे इन प्रमाणों से एक बात तो साफ़ हो गई, मैंने मानव के विकास और मानव सभ्यता के विकास में जितना भी अध्ययन किया है सारा का सारा इतिहास किसी न किसी महान नदी के अगल बगल से ही आरंभ होता है और माता नर्मदा का तो इतिहास ही पौराणिक है, जिनके किनारे महर्षि जबाली ने तपस्या कि थी और उन्ही के नाम पर जबलपुर का नाम भी पड़ा, इन्ही के घाट पर तपस्या कर के इक्ष्वाकुवंशीय महाराजा मान्धाता ने भगवान शिव को प्रसन्न किया था तथा यहीं पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजित कर लिया था.

मेरा जबलपुर न सिर्फ ऐतिहासिक दृष्टि से अपितु पौराणिक दृष्टि से भी बहुत प्राचीनतम नगरों में से एक है जिसका प्रमाण कई ग्रंथों में मिलता है जिसकी अधिक जानकारी मै आपको आने वाले लेखों दे सकूँगा.

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