इस देश का जितना बंटाधार घटिया राजनीति या राजनीति के दलालों अर्थात नेताओं ने नहीं किया उस से ज्यादा तथाकथित बुद्धिजीवी पत्रकारों ने कर दिया. मूल उद्देश्य भूल कर पत्रकारिता आज चाटुकारिता के चरम पर है, एक समय था जब सत्य के पताका लिए देश में स्वतंत्र पत्रकारों ने पत्रकारिता का श्री गणेश किया था उनके इस प्रयास ने देश की स्वतंत्रता में अभूतपूर्व योगदान दिया लेकिन ये किसने सोचा था की देश को स्वतंत्र करने के बाद यही पत्रकारिता स्वयं परतंत्र हो जाएगी और धीरे धीरे ये निम्न श्रेणी की पत्रकारिता देश को दीमक की भांति चाटना आरम्भ कर देगी, अब तो स्थिति ये है की देश को चाटने का प्रयास तेज हो गया है.

वर्तमान में पत्रकारिता राजनीति और लोभ की दासी बनी बैठी है, सत्य के स्वतंत्र प्रस्तुतीकरण को प्रसारण की अनुमति नहीं है सिर्फ इसलिए की सत्य का व्यापार नहीं हो सकता. जीवन यापन के भौतिक साधन जुटाने के और भी उपाय हैं उसके लिए सत्य, राष्ट्र की अस्मिता और भविष्य को दांव पर लगाने की क्या आवश्यकता है? कुछ भी बेचो खूब कमाओ अपने भंडार भर लो लेकिन सत्य मत बेचो ऐसा करना बड़ा घातक सिद्ध हो रहा है, न जाने इसका परिणाम क्या हो?

पत्रकारिता के व्यापारीकरण ने क्या क्या नहीं बेचना आरंभ कर दिया, धर्म, विचार, विदेशी प्रभाव, राष्ट्र विरोधी षड्य्नात्रों तक का समर्थन कर इस प्रकार से प्रस्तुत कर के बेचे जाते हैं की प्रथम द्रष्टया तो ये लगता है की यही सही है. ऐसी पत्रकारिता एक प्रकार से राष्ट्र को शक्तिहीन बनाने में मुख्य भूमिका निभा रही है और इसका लाभ क्या है? थोड़ी सी चाँदी बस और ये कब तक चलेगी?

आज पत्रकार वर्ग अपना अलग प्रभुत्व रखता है, नायक को खलनायक और खलनायक को नायक बना कर प्रस्तुत कर देते हैं, पर इसका अर्थ ये कदापि नहीं है की ये ऐसा किसी भी मूल्य पर करें.
भारत वर्ष का बहुत बड़ा वर्ग अब भी अशिक्षित है और बहुत बड़ा शिक्षित वर्ग भी राजनीतिक दांव पेंच या प्रस्तुतीकरण के घुमाव फिराव को समझने में असमर्थ है अथवा सत्य के गर्त तक जाने का प्रयास नहीं करता जिसके कई कारण हो सकते हैं और इसी बात का लाभ उठाकर पत्रकार बंधू जो चाहे बेच लेते हैं. जनता का विश्वास एक सत्य समाचार पर होता है और उसे प्रस्तुत करने का दायित्व पत्रकारों का है.

बहुत छोटी सी लेकिन बहुत महत्वपूर्ण बात लिखने का प्रयास कर रहा हूँ, पत्रकारिता की स्थिति वस्तुतः बड़ी चिंतनीय है और कर्म निंदनीय भी पत्रकारों को तो ये बात पता है लेकिन वे समझने का प्रयास नहीं करेंगे इसलिए आम नागरिकों से ही यही अपेक्षा है की वे इस दोगलेपन को समझ लें.

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