करो बंधुगण करो विचार
किस प्रकार हो अब उद्धार
सब कुछ गया, जाय, बस एक
रखो हिन्दूपन की टेक
ऐसा है वो कौन विवेक
करता है जो हमको एक?
और बढ़ा सकता हो मान?
केवल हिन्दू हिंदुस्तान ! – मैथिलीशरण गुप्त

चाहता हूँ सबसे पहले कवि परिचय करा दूँ, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, एक बहुत ही असाधारण व्यक्तिव के धनी पुरुष का नाम , एक ऐसा नाम जिसे शायद ही किसी काव्य प्रेमी भारतीय ने ना सुना हो, गुप्त जी का जन्म चिरगांव जिला झाँसी (उ.प्र.) में ३ अगस्त सन १८८६ ई. में हुआ था. मेरे लेख में गुप्त जी का इतना परिचय पर्याप्त है क्यूंकि मै चाहता हूँ की थोडा प्रकाश हम उपरोक्त पंक्तिओं पर भी डाल लें.

राष्ट्र कवि होने के नाते से गुप्त जी ने अपनी इन पंक्तिओं में जो लिखा वो उस समय की बात थी जब भारतवर्ष शायद स्वतंत्र भी नहीं हुआ था, उनहत्तर वर्षों के अपने जीवन काल में इन्होने राष्ट्र की वर्तमान परिस्थितियों में कई उतर चढाव देखे जिसमे से सबसे प्रमुख थी परतंत्रता, स्वतंत्रता और स्वतंत्रता के पश्चात् स्वतंत्र भारत का भविष्य, ये वो गंभीर विचार था जो आने वाली पीढ़ियों के लिए था. गुप्त जी वर्तमान परिस्थितिओं से अवगत थे और ये पंक्तियाँ लिखने का भाव वर्तमान परस्थितियों ने ही पैदा किया था.

विचार करने योग्य बात ये है की या तो वर्तमान में परस्थितियाँ उतनी ही कोमल थी जितनी आज हैं या फिर भविष्य का एक दम सटीक आंकलन कर लिया था, मेरे विचार में दोनों ही बातें होना चाहिए.
उपरोक्त पंक्तियों में गुप्त जी ने उस समय के बहुसंख्य और सबल हिन्दू जनता संगठित होने का आह्वान किया था, ये तो विश्व विख्यात है की भारत हिन्दूराष्ट्र था और जब तक पूर्णतः हिन्दूराष्ट्र था सबल और संपन्न था, हाँ अंकों आक्रमणों और आक्रान्ताओं का सामना करना पड़ा परन्तु अंत में विजय हमारी हुई, कारन सिर्फ एक था की हिन्दू संगठित था.

भारतवर्ष की सम्पन्नता हिंदुत्व से थी और जब भारत परतंत्र हुआ सब लूट लिया गया, खंडित होना पड़ा, दुर्भाग्य का सामना हुआ और परतंत्रता की समय सीमा बढती गई, कई विदेशी हाथों में भारत की अस्मिता आई परन्तु फिर भी हम संभले और संभलते चले गए, खैर विषयवस्तु पर आते हैं और बात करते है आखिर राष्ट्रकवि को ये पन्तियाँ क्यों लिखनी पड़ी, कारण पर मैंने शोध नहीं की परन्तु इतना कह सकता हूँ की गुप्त जी के अनुसार भारत की स्वतंत्रता के समय जब बात राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता की आई होगी तो उन्होंने भविष्य आंक लिया होगा, और ये बात आज की परिस्थितयों में शत प्रतिशत खरी बैठ रही है. देश धर्मो से सर्वोपरि है और निश्चित ही ये अकाट्य सत्य है लेकिन धर्म क्या है इस पर विचार कौन करेगा?
मै सिर्फ इतना जनता हूँ की सिर्फ जब तक भारत पूर्णतः हिन्दू राष्ट्र नहीं हो जाता सफलता और प्रगति की पुनरावृत्ति असंभव है.

राष्ट्र की सम्पन्नता और हित के लिए संघर्ष वीरोचित है जो की प्रत्येक “हिन्दू स्थानीय” का कर्त्तव्य है.

किसने कहा पाप है समुचित
स्वप्त प्राप्ति हित लड़ना?
उठा न्याय का खडग समर में
अभय मारना मरना?
न्यायोचित अधिकार मांगने
से न मिले तो लड़के,
तेजस्वी छीनते समर को
जीत या कि खुद मरके ! – रामधारी सिंह “दिनकर”

पुनः क्या कोई है जो ये नहीं जानता रामधारी सिंह “दिनकर” कौन थे? फिर भी मै बता देता हूँ की १९०८ ईस्वी में बिहार प्रान्त के बेगुसराय में जन्मे दिनकर आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में ख्याति लब्ध हैं. और उनकी उपरोक्त पंक्तियों का भावार्थ प्रस्तुत करने की आवश्यकता सी नहीं लगती क्यूंकि सपनी सरल शैली में उन्होंने सब कुछ कह दिया है.

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