देश तरक्की कर रहा है, हाँ भाई देश तरक्की कर रहा है सच में इस में इतना विस्मित होने की जरूरत नहीं है, भारतीयों ने सिर्फ देश ही नहीं विदेशी बाज़ार में भी अपना वर्चस्व कायम कर लिया है !

रात में नौकरी सिर्फ बड़ी बड़ी इमारतों, नगरियों और तथाकथित सोसाइटी के रक्षक अर्थात चौकीदार नहीं करते बल्कि कुछ खूब ज्यादा पढ़े लिखे युवाओं में इस का काफी चलन हो गया है, आज की पीढ़ी पश्चिमी सभ्यता से अत्यंत प्रभावित है और इसके काफी समीप भी है, तो रात में नौकरी करना आजकल “ट्रेंड्ज़” बन गया है, कुछ देशी तो कुछ विदेशी कॉल सेंटर्स इस तरह की नौकरियों में अच्छे और आकर्षक अवसर प्रदान कर रही हैं, खैर ये नौकरी कितनी भी आकर्षक हो और प्रतिव्यक्ति आय कितनी भी उच्च हो कुछ बातें है जो फिर भी रात की नौकरियों में अच्छी नहीं हैं.

रात भर काम करने वाला चौकीदार (अब वो चाहे किसी बड़ी कंपनी का प्रबंधक भी हो है तो चौकीदार ही) अपनी प्राकृतिक दिनचर्या, क्रियाकलापों के विपरीत आचरण करने को बाध्य हो जाता है, सोने का जो समय स्वयं प्रकृति ने निर्धारित किया है उस समय का उपयोग जबरन जागकर कार्य में लगाता है, जब मन, बुद्धि, चित्त और शरीर को वास्तव में विश्राम की आवश्यकता होती है तब इन्हीं चीज़ों का भरपूर प्रयोग कर रहा होता है और वस्तुतः जब ये अंग अपने उपयोग के चरम पर होते है तो इन्हें विश्राम देने के प्रयास में लग जाता है, है ना उल्टा पुल्टा?

रात के चौकीदार का एक सबसे महत्वपूर्ण और उपयोगी अंग सबसे ज्यादा परेशान होता है, वो है पेट, जिसके लिए ये सारी महनत होती है, इस पेट का क्या करें इसे जब भूख लगती है तब इसका मालिक सो रहा होता है और जब मालिक जागता है तब तक भूख मर चुकी होती है, फिर आरंभ होता है पेट के क्रोध का क्रम, कभी ये पेट अपने में हवा भर कर अपनी भूक मिटा लेता है तो मालिक को वायुविकार की समस्या का सामना करना पड़ता है, कभी खाली होने के डर से यही पेट तीन चार दिन तक का खाना भंडारित कर लेता है जिसके कारण मालिक को भांति भांति की समस्याओं का सामना करना पड़ जाता है, अब ये मत पूछिए इन समस्याओं के नाम क्या है? आशा करता हूँ आप भलीभांति परिचित होंगे पर विश्वास मानिये और वैद्यों ने भी सिद्ध किया है की शरीर की सबसे ज्यादा विषमताओं और रोगों का जनक पेट का क्रोधित होना है, अगर ये भाईसाब आपसे क्रोधित है तो किसी भी काम में आपका मन नहीं लगने देंगे, और कभी कभी तो विचित्र विचित्र ध्वनिओं के रुदन से आपको भरी सभा में लज्जित भी कर देते है.

रात के चौकीदार (विशेषकर जो कार्यालयों में सेवारत हैं) का अभिन्न अंग जो की कर्यालय में सजी मेजों और कुर्सिओं की शोभा बढाता है, चौकीदार की बैठक का आधार है, मै जानता हूँ आप समझ गए मै किस अंग विशेष की बात कर रहा हूँ, बड़ा कष्ट उठाता है बेचारा, कभी थक कर बायाँ किनारा करता है तो दायें को आराम कभी दायाँ किनारा किया तो बाएं को आराम दोनों बेचारे ऐसे ही आपसी सामजस्य से जैसे तैसे जीवन व्यतीत कर रहे हैं, इस अंग की सबसे बड़ी विडंबना है की अपराध किसी और का होता है और सारे ताने, गालियाँ इसे सुननी पड़ती है, जी हाँ पेट महोदय के दुस्साहसों का दुष्परिणाम यही अंग झेलता है. बताइए कितना अत्याचार है ना?

“रीढ़ की हड्डी” वैसे तो मैंने इस शीर्षक का कोई व्यंग्य पढ़ा था कभी अपनी पाठ्य पुस्तक में जिसमे लेखक ने रीढ़ की हड्डी की तुलना व्यक्ति के मान सम्मान से की थी लेकिन मेरे इस लेख में रीढ़ की हड्डी सच में एक चौकीदार की रीढ़ की हड्डी ही है, जो की रात तो रात दिन में भी करुण रुदन करते हुए अपने लिए थोडा सा विश्राम मांगती है, जवान है लेकिन फिर भी झुकी जा रही है बेचारी क्या करे मालिक सीढ़ी होने का अवसर ही नहीं देता.

इन सब समस्याओं के बाद भी समस्याओं का क्रम अभी ख़तम नहीं होता, कुछ चीज़ें है जो रात के चौकीदार को और भी दुखी करती हैं जैसे मेरी इस त्रिवेणी के भाव में निहित है-

“रात का मुसाफिर हूँ यारों अंधेरो ने घेरा है !
जिन्दगी की राहों में मंजिल मेरा सबेरा है !

अफताब जरा जल्दी आना, घर साथ चलेंगे !!” – गोपी (अर्थात मैं)

क्या करें रात के चौकीदार का दिन रात से आरंभ होकर रात में ही समाप्त हो जाता है, भोर का सुनहरा सूर्य तो सिर्फ एक शर्त में देखने मिलता है जब कार्य की अधिकता हो जो की ये चौकीदार नहीं चाहता, अच्छा मेरी इस बात का समर्थन हिंदी सिनेमा जगत के महान गीतकार और मेरे प्रिय गुलज़ार साब ने भी किया है कुछ इस तरह से कि

“पौ फूटी है और किरणों से काँच बजे हैं
घर जाने का वक्‍़त हुआ है,पाँच बजे हैं

सारी शब घड़ियाल ने चौकीदारी की है!” – गुलज़ार

बताईये गुलज़ार साब ने इस दर्द को कितनी समीपता से अनुभव किया होगा। मै नहीं जानता कि उन्होंने कभी रात में चौकीदारी कि है कि नहीं पर इतना जानता हूँ कि अपने आरंभिक दिनों में परिश्रम बहुत किया है, उनकी लेखनी और स्वरों कि गंभीरता मुझे इस बात का अनुभव तो कराती है.

“फुरसत के वो पल कहा से लाऊं,
कभी तेरी जुल्फों के साये में जो बिताये !

कुछ दिन वो भी थे कुछ रातें वैसी भी,
तुम थीं मै भी था और फुरसते भी !!”

मेरी उपरोक्त पंक्तियाँ उस चौकीदार कि पीढ़ा है जिसके पास कभी इतना समय हुआ करता थी कि उसमे से थोडा सा निकाल कर अपने प्रिय के साथ व्यतीत कर पाता था, परन्तु अचानक से उसके जीवन में ये दुर्घटना घटी कि उसे रात कि चौकीदारी के लिए उपयुक्त मानकर कर रात में तैनात कर दिया गया, इन पंक्तिओं को दोहराने के सिवाय क्या कर सकता है बेचारा.

और भी बहुत सा दर्द छुपा है चौकीदारों के सीने में, कभी सर्द हवा के थपेड़े तो आग बरसाती ग्रीष्म कि गर्म हवाएं, कभी चोरों और लुटेरों का डर तो कभी अवकाश ना मिलने कि व्यथा, बस काम करो काम.

आप ये सोच रहे होंगे कि अचानक से मुझे क्या हुआ? मै क्यों रात के चौकीदारों कि समस्याओं के बारे में इतना सोचने लगा? क्यों भावुक हो इतना कुछ लिख गया?

क्या बताऊँ साहब पिछले कुछ महीनो से मेरी चुस्त चौकीदारी निरंतर चल रही है.

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