“उलटे होर ज़माने आये,
काँ लग्गड़ नु मारन लग्घे,
चिड़िया जुर्रे खाए !
अराकियाँ नु पाई चाबक,
पोंदी गड्ढे खुद पवाए !!
बुल्ला हुकुम हजुरों आया,
तिस नु कौन हटाये
उलटे होर ज़माने आये”

बुल्ले शाह ने कलियुग के प्रभाव का वर्णन अपनी इस रचना में किया है।
उल्टा जमाना आगया है, कौवे गिध्हों को मारने लगे है, चिड़ियाँ बाजों को खा रही है। घोड़ों को चाबुक मारे जा रहे है और गधों को गेहूं की हरी हरी बालियाँ खिलाई जा रही है, और ये आदेश तो स्वयं परमात्मा ने दिया अब इसको कौन हटाये.

७० के दशक में आई एक फिल्म “गोपी” जिसमे दिलीप कुमार ने अभिनय किया है में बुल्ले शाह की इन पंक्तिओं का समर्थन करता हुआ एक गीत था –

“रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलियुग आएगा|
हंस चुगेगा दाना दुनका, कौवा मोती खायेगा ||”

दोनों रचनाओं की तुलना करें तो समझ आता है की बेचारा “कौवा” और “गधा” कवियों का सबसे प्रिय उदाहरण है, इन दोनों का तुलनात्मक उदाहरण कही न कही मिल ही जाता है, आखिर इन जीवों की कौन सी पीढ़ी ने किस समय में कौन सा अपराध किया था जिसका दंड ये प्रजातियाँ आज तक कविताओं और लेखों में भुगत रही है, खैर छोडिये हमें क्या हम क्यों इस बहस में पड़ें की बाबा बुल्ले शाह या अन्य कविओं ने इन्हें ही उदाहरण के लिए उपयुक्त समझा हमें तो ये समझना है की वर्तमान परिस्थितिओं में हम इनकी तुलना किस से करें?

बुल्ले शाह की इन पंक्तिओं को वर्तमान परिवेश में प्रस्तुत करूँ तो ये बात “कांग्रेस” और “गाँधी परिवार” पर सटीक बैठती है। चोरों के हाथ में भारत जैसे संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र का शासन है और बुद्धिजीवी वर्ग एक किनारे बैठा है, हमने बचपन में बाल भारती की पुस्तक में एक पाठ पढ़ा था “अंधेर नगरी चौपट राजा” जो की आज प्रत्यक्ष देखने को मिल रही है।

अगर बुल्ले शाह की इन्ही पंक्तियों को मै कटाक्ष के रूप में कहना चाहूँ तो ये कहना बिलकुल भी अनुचित नहीं होगा की “बुल्ले शाह शायद भविष्य द्रष्टा थे, वो जानते थे की भारत में मुगलों के क्रूर शासन के बाद कांग्रेसी कुशासन आएगा” और बस इसलिए ये पंक्तियाँ पूर्व में ही लिख दी.

अब ये पूछ कर लज्जित मत करना की उपरोक्त उदाहरण में मैंने “कौवा” और “गधे” की तुलना किस से की है|

Advertisements